"मैं तुम्हे मोह्हबत सिखा दूं.."
हाँ मैं चाहता हूँ तुम मेरे ख्वाबों में आओ,
घंटों हम दोनों बैठ कर चाँद-चांदनी की मोह्हबत की बात करें..
हाँ, जानता हूँ ज़्यादा मिलते नहीं हैं हम,
एक बात जानती हो सूरज और चाँद भी नहीं मिलते..
पर हमेशा वो एक दूसरे की सलामती की दुआयें माँगते है,
बेशक वो दूर है एक-दूजे से फिर भी अपने बीच का सब जानते है..
तुम गुम हो अपने ख़्वाबों में,अपने किसी ख्याल में,
मैं भी उलझा हूँ तुम्हारे किसी सवाल में..
चल कहीं इतना दूर निकल जाएँ जहाँ बस मैं और तुम रहो,
मैं चुप-चुप रहूँ और तुम सब कुछ कहो..
कल रात के बीचों-बीच दिल का समुन्द्र बोला मुझसे चल तेरे अन्दर की आग बुझा दूं,
तभी मेरे अन्दर का "तुम" जाग उठी और मैं बोल उठा आओ मैं तुम्हे मोह्हबत सिखा दूं..
प्रवीण झा
15/5/2014
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